खबीस से सामना

Khabis Se Samna


एक बार विवेक जी शहर से अपने गाव आए थे। वह रात के समय बस स्टैंड पर उतरे। रात का समय होने के कारण उन्हे कोई सवारी मिलने की उम्मीद नहीं थी
, लेकिन खुशकिस्मती से उन्हे एक ऑटो वाला नजर आ ही गया। वह उस ऑटो वाले के पास पहुंचे और बोले,

“भैया सारणपुर चलोगे?”

ऑटो वाले ने कहा, “जी साहब... क्यू नहीं। जरूर चलूँगा।”

ऑटो वाले से किराए की बात वगैरा कर के वे ऑटो मे बैठ गए और सारणपुर के लिए निकाल पड़े। कुछ दूर चलते ही वे एक दोराहे पर आ पहुंचे, जहा दाया वाला रास्ता सीधा सारणपुर को जाता था और बाया रास्ता एक छोटे से गाव से होकर सारणपुर की ओर मुड़ता था। विवेक जी ने देखा की ऑटो वाले ने ऑटो को बाए वाले रास्ते की ओर मोड दिया। यह देख कर वह उस पे बरस पड़े।

“यह क्या कर रहे हो भाई? ऑटो इस तरफ क्यू मोड रहे हो?”

“साहब आप पहली बार जा रहे हो क्या सारणपुर?” ऑटो वाले ने पूछा।

विवेक जी ने जवाब दिया, “पहली बार नहीं आ रहा हूँ, वह तो मेरा अपना ही गाव है। हा बहुत सालो बाद आ रहा हूँ, लेकिन इतना तो जानता हूँ की सारणपुर को दाया वाला रास्ता जाता है। बाया वाला लंबा रास्ता ले कर तुम मुझ से ज्यादा किराया वसूलना चाहते हो क्या?”

इस पर ऑटो वाले ने कहा, “साहब, सवाल किराए का नहीं है। दाया वाला रास्ता रात के समय सफर करने हेतु सुरक्षित नहीं है। और रहा सवाल किराए का, तो जो तय हुआ है, मैं उस से ज्यादा किराया आप से नहीं लूँगा। लेकिन मेरी मानिए और बाए वाले रास्ते से ही चलिये।”

विवेक जी ने सोचा की अगर बात किराए की नहीं है, तो जरूर आगे जा कर किसि सुमसाम जगह पर रुक कर मुझे लूटने का इरादा है इसका। इस लिए अपनी सुरक्षा को देखते हुए विवेक जी ने कहा,

“नहीं, मैं वो सब नहीं जानता। तुम ऑटो को दाए वाले रास्ते से ही ले जाओ।”

“ऐसा मत कीजिये साहब… आप समझ नहीं रहे है।” ऑटो वाले ने मिन्नत करते हुए कहा।

विवेक जी ने डाटते हुए कहा, “जैसा मैं कहता हु वैसा ही करो।”

“ठीक है साहब। जैसी आपकी मर्जी।” ऐसा कह कर ऑटो वाले ने ऑटो को दाये रास्ते की ओर घुमाया और वे दोनों सारणपुर की ओर चल पड़े। थोड़ी ही दूर पहुँचने पर विवेक जी ने देखा की एक लंबा, तगड़ा आदमी रास्ते के किनारे खड़े होकर आपने हाथो मे तंबाकू रगड़ रहा था। वह आदमी बहुत ही विशाल नजर आ रहा था, जैसे की कोई पहलवान ही हो। जैसे ही ऑटो की लाइट्स उस आदमी पर पड़ी, उसने ऑटो को रोकने का इशारा किया। ऑटो वाला उस आदमी को टालने हेतु ऑटो को उससे दूर ले कर तेज करते हुए सीधे ले गया।

ऑटो वाले की यह हरकत देख कर विवेक जी को गुस्सा आया और वह ऑटो वाले से कहने लगे,

“यह क्या किया तुमने। इंसानियत नाम की कोई चीज है की नहीं तुम्हारे अंदर? इतने सुमसाम रास्ते पर एक अकेले आदमी को ऐसे ही छोड़ दिया।”

ऑटो वाले ने एकदम शांत स्वरो मे जवाब दिया, “साहब, आप बहुत दिनो बाद आए हो न, इसी लिए आपको नहीं पता यह क्या चल रहा है। थोड़ी देर रुकिए फिर सब पता चल जाएगा। बस आप ऑटो से अपना हाथ भी बाहर मत निकालना।”

उसके ऐसा कहते ही विवेक जी ने देखा की वही आदमी जो उन्होने पहले देखा था, फिर से सामने, रास्ते के किनारे खड़े हो कर ऑटो को रोकने का इशारा कर रहा था। विवेक जी हैरान थे की ऐसा कैसे हो सकता है। वह आदमी इतनी जल्दी इतने दूर कैसे पहुँच गया, वह भी ऑटो से पहले। औटोवाले ने फिर से उससे बचते हुए ऑटो भगाई। विवेक जी ने पूछा,

“यह क्या माजरा है?”

ऑटो वाला बोला, “साहब, यह एक खबीस है। इस रास्ते पर इसी का आतंक है। लेकिन घबराइए नहीं, यह राह चलते इंसनों को ही अपना शिकार बनाता है। ऑटो के अंदर हम सुरक्षित है।”

अगले ही पल विवेक जी ने देखा की वह आदमी अब रास्ते के बीचोबीच, ऑटो के एकदम सामने आ कर खड़ा हो गया था। लेकिन ऑटो वाले ने बिना किसी झिझक के ऑटो सीधी दिशा मे भगाई। विवेक जी को लगा की अब ऑटो उस आदमी से टकरा जाएगी, लेकिन ऑटो उस आदमी के नजदीक पहुँचते ही उस आदमी ने ऊपर की तरफ एक छलांग मारी। अगले ही पल वह नीचे आया, लेकिन इस बार वह आदमी नहीं था, वह एक बूढ़ी औरत बना हुआ था। उसने फिर से छलांग मारी और नीचे आया तो एक बैल था। अगली छलांग मे वह एक कुत्ता था, फिर अगली छलांग मे वह एक शेर था।

उसने ऐसी कई छलांगे लगाई, और हर बार उसने एक नया रूप लिया था। यह सब देख कर विवेक जी बहुत ही ज्यादा डर गए थे; उनके पसीने छूटे हुए थे। लेकिन ऑटो वाला डटा हुआ था, उसने ऑटो न रोकते हुए अपना रास्ता बनाया और तेज चल पड़ा। थोड़ी ही दूर तक आ कर विवेक जी ने देखा की अब वह आदमी गायब हो चुका था। यह देख कर उनकी जान मे जान आई।

कुछ देर बाद सारणपुर आ गया। विवेक जी ऑटो से उतरे और ऑटो वाले को किराया देने लगे। उनकी आंखो मे आसू आ गए थे; वह देख कर ऑटो वाला बोला,

“क्या हुआ साहब, आप रो क्यू रहे हो?”

विवेक जी बोले, “मैं आपका आभारी हूँ और शर्मिंदा भी। आप मेरे ही भले के लिए सोच रहे थे, लेकिन मैंने आप पर शक किया। आपकी ही के हिम्मत के कारण मैं उस मुसीबत से निकाल पाया, नहीं तो डर के मारे मेरे तो हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए थे।”

ऑटो वाला बोला, “कोई बात नहीं साहब, यह तो मेरे काम का हिस्सा बन चुका है। इससे पहले भी मेरा उस खबीस के साथ सामना हो चुका है। मैं भी पहली बार ऐसेही डरा था जैसे आप डरे हो, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। आप अपने गाव मे बहुत सालों बाद आए है न, इसी लिए आपको यहा के हालत मालूम नहीं है। अब की बार आप यह जरूर याद रखना की आप अगर अपने गाव आए और रात का समय हो, तो गलती से भी वह रास्ता मत लेना।”

“बिलकुल नहीं...” विवेक जी बोले, “अब तो मैं हमेशा लंबे रास्ते से ही आऊँगा।”

ऑटो वाले ने अपना किराया लिया और वहाँ से लंबा वाला रास्ता पकड़ कर चला गया। विवेक जी ने भी अपना सामान उठाया और अपने घर की तरफ चल दिये। 

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